वैदिक वास्तु शास्त्र के अनुसार होना चाहिए घर...! /
वैदिक वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर में पीतल का कछुआ रखना शुभ माना जाता है।
घर किस प्रकार के वास्तु-नियमों के अधीन होना चाहिए?
वैदिक वास्तु शास्त्र के ऋग्वेद का अनुसार कैसा होना चाहिए संपूर्ण घर, जानिए मेन गेट से बेडरुम तक किस चीज के लिए कौन सी दिशा है सही।
सुख-समृद्धि, धन-धान्य, आरोग्य और पारिवारिक शांति के लिए वास्तु का समन्वित शास्त्रीय विवेचन
वैदिक वास्तु शास्त्र का ऋग्वेद के अनुसार घर में कौन सी दिशा में क्या होना चाहिए।
भारतीय सनातन परंपरा में गृह को केवल रहने की चार दीवारों वाला स्थान नहीं माना गया है। गृह वह स्थान है जहाँ परिवार का जीवन चलता है, अन्न पकता है, संतान का पालन होता है, पूजा होती है, धन अर्जित और सुरक्षित किया जाता है तथा सुख-दुःख का अनुभव होता है। इसलिए गृह-निर्माण और गृह-विन्यास को भारतीय परंपरा में विशेष महत्व प्राप्त हुआ।
इस का उल्लेख ऋग्वेद और कई वास्तु ग्रंथों में मिलता है।
भवन भास्कर और विश्वकर्मा प्रकाश सहित अन्य ग्रंथों में भी मिलता है।
वास्तु के अनुसार एक आदर्श मकान का मेनगेट सिर्फ पूर्व या उत्तर दिशा में ही होना चाहिए।
वहीं आपके घर का ढलान पूर्व, उत्तर या पूर्व - उत्तर ( इशान कोण ) की और होना शुभ माना गया है।
इस तरह वास्तु के अनुसार घर के कमरे, हॉल, किचन, बाथरुम और बेडरुम एक खास दिशा में होने चाहिए।
जिससे घर में वास्तुदोष नहीं होता और लोग सुखी रहते हैं।
वास्तुशास्त्र का मूल उद्देश्य भवन, भूमि, दिशा, प्रकाश, वायु, जल, अग्नि और स्थान का ऐसा संतुलन स्थापित करना है जिससे गृह उपयोगी, सुरक्षित, स्वच्छ और रहने योग्य बने।
ज्योतिषीय परंपरा में जन्मकुंडली से व्यक्ति के गृह-सुख, संपत्ति, धन, कर्म और भाग्य के संकेतों का अध्ययन किया जाता है। प्रश्नकुंडली किसी विशेष समय पूछे गए प्रश्न के संकेतों का अध्ययन करती है। गोचर वर्तमान समय की ग्रहगत स्थिति का संकेत देता है। नक्षत्र-पद्धति समय के सूक्ष्म विचार में सहायक मानी जाती है।
लेकिन इन सभी पद्धतियों का अपना-अपना क्षेत्र है। वास्तु के वास्तविक दोष का निर्णय अंततः भवन की वास्तविक दिशा और संरचना देखकर ही किया जाना चाहिए।
🌞 घर को दिशाओं के संतुलन के अधीन होना चाहिए
वास्तु-परंपरा में आठ दिशाओं और उनके मध्यवर्ती कोणों का विचार किया जाता है—
पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, आग्नेय, नैऋत्य और वायव्य।
इन दिशाओं को अलग-अलग देवता, तत्त्व और कार्यों से जोड़ने वाली विभिन्न वास्तु परंपराएँ हैं।
घर में किसी एक दिशा को देखकर पूरा निर्णय नहीं करना चाहिए। पूरे भवन का संतुलित विन्यास देखना आवश्यक है।
एक दिशा अत्यधिक खुली हो और दूसरी दिशा अनावश्यक रूप से बंद हो, तो भवन का व्यावहारिक संतुलन भी प्रभावित हो सकता है।
इसलिए वास्तु का प्रथम नियम है—
“घर को दिशा-संतुलन के अधीन होना चाहिए, केवल एक दिशा के नियम के अधीन नहीं।”
पूर्व दिशा -
🌅 पूर्व दिशा का महत्व
पूर्व दिशा सूर्य के उदय की दिशा है। वास्तु परंपरा में इसे प्रकाश और आरंभ से जोड़ा जाता है।
घर में पूर्व दिशा में प्राकृतिक प्रकाश और वायु का उचित प्रवेश होना लाभकारी है।
नियम
- पूर्व दिशा को अनावश्यक रूप से बंद न रखें।
- वहाँ अत्यधिक कबाड़ न जमा करें।
- खिड़कियाँ और प्रकाश के मार्ग स्वच्छ रखें।
- प्रातः सूर्य का प्रकाश घर में आने दें।
प्रभाव
प्राकृतिक प्रकाश घर के वातावरण को उज्ज्वल बनाता है। वास्तु-परंपरा इसे सकारात्मक गृह-वातावरण से जोड़ती है।
पूर्व दिशा सूर्योदय की दिशा है।
इस दिशा से सकारात्मक व ऊर्जावान किरणें हमारे घर में प्रवेश करती हैं।
यदि घर का मेनगेट इस दिशा में है तो बहुत अच्छा है।
खिड़की भी रख सकते हैं।
पश्चिम दिशा -
आपका रसोईघर या टॉयलेट इस दिशा में होना चाहिए।
रसोईघर और टॉयलेट पास - पास न हो, इसका भी ध्यान रखें।
उत्तर दिशा -
💰 उत्तर दिशा और आर्थिक व्यवस्था
वास्तु परंपरा में उत्तर दिशा को धन और आर्थिक गतिविधियों से जोड़ा जाता है।
इसलिए उत्तर दिशा को स्वच्छ और व्यवस्थित रखना परंपरागत रूप से शुभ माना जाता है।
लेकिन यह कहना उचित नहीं कि केवल उत्तर दिशा खुली कर देने से धन निश्चित रूप से आने लगेगा।
धन के वास्तविक ज्योतिषीय अध्ययन में द्वितीय भाव, एकादश भाव, दशम भाव, नवम भाव आदि का विचार किया जाता है।
उपाय
उत्तर दिशा में अनावश्यक अवरोध हटाएँ। प्राकृतिक प्रकाश और वायु का उचित प्रबंध रखें तथा घर के आर्थिक दस्तावेजों और आवश्यक वस्तुओं को व्यवस्थित रखें।
इस दिशा में घर के सबसे ज्यादा खिड़की और दरवाजे होने चाहिए।
घर की बालकॉनी व वॉश बेसिन भी इसी दिशा में होना चाहिए।
यदि मेनगेट इस दिशा में है और अति उत्तम।
दक्षिण दिशा -
दक्षिण दिशा में किसी भी प्रकार का खुलापन, शौचालय आदि नहीं होना चाहिए।
घर में इस स्थान पर भारी सामान रखें।
यदि इस दिशा में द्वार या खिड़की है तो घर में नकारात्मक ऊर्जा रहेगी और ऑक्सीजन का लेवल भी कम हो जाएग।
इससे घर में क्लेश बढ़ता है।
उत्तर - पूर्व दिशा -
🕉️ ईशान कोण की पवित्रता
उत्तर-पूर्व दिशा को वास्तु परंपरा में ईशान कोण कहा जाता है और इसे अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
इस क्षेत्र को हल्का, स्वच्छ और प्रकाशयुक्त रखना सामान्य वास्तु-सिद्धांत है।
पूजा, ध्यान या आध्यात्मिक गतिविधियों के लिए ईशान दिशा का विचार कई वास्तु परंपराओं में किया जाता है।
यहाँ क्या नहीं करना चाहिए?
- अनावश्यक कबाड़ न रखें।
- अत्यधिक भारी भंडारण न करें।
- गंदगी और सीलन न रहने दें।
- ऐसी संरचना न बनाएँ जिससे प्रकाश और वायु का मार्ग पूरी तरह बंद हो जाए।
फल
वास्तु परंपरा में ईशान की शुद्धता को मानसिक शांति, आध्यात्मिक वातावरण और गृह-सौहार्द से जोड़ा जाता है।
इसे ईशान दिशा भी कहते हैं।
यह दिशा जल का स्थान है।
इस दिशा में बोरिंग, स्वीमिंग पूल, पूजास्थल आदि होना चाहिए।
इस दिशा में मेनगेट का होना बहुत ही अच्छा रहता है।
उत्तर - पश्चिम दिशा -
🌬️ वायव्य दिशा और गति
उत्तर-पश्चिम को वायव्य कोण कहा जाता है। यह वायु और गति का क्षेत्र माना जाता है।
अतिथि-कक्ष, आवागमन और ऐसे कार्य जिनमें परिवर्तन अधिक हो, उनके लिए इस दिशा का विचार कुछ वास्तु परंपराओं में किया जाता है।
नियम
- अत्यधिक कबाड़ न रखें।
- प्राकृतिक वेंटिलेशन रखें।
- क्षेत्र को पूरी तरह बंद और सीलनयुक्त न रखें।
- अत्यधिक भारीपन से बचें।
इसे वायव्य दिशा भी कहते हैं।
इस दिशा में आपका बेडरूम, गैरेज, गौशाला आदि होना चाहिए।
दक्षिण - पूर्व दिशा -
🔥 आग्नेय दिशा और अग्नि
दक्षिण-पूर्व दिशा को आग्नेय कोण कहा जाता है। वास्तु परंपरा में इसका संबंध अग्नि तत्व से किया जाता है।
रसोई के लिए आग्नेय दिशा को प्राथमिकता देने की परंपरा प्रसिद्ध है।
नियम
- गैस चूल्हा सुरक्षित स्थान पर रखें।
- सिंक और चूल्हे को बिल्कुल सटाकर न रखें।
- रसोई में पर्याप्त वेंटिलेशन हो।
- अग्नि और विद्युत उपकरण सुरक्षित हों।
प्रभाव
यहाँ वास्तु के साथ व्यावहारिक सुरक्षा भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। गलत ढंग से रखे गैस या विद्युत उपकरण वास्तविक दुर्घटना का कारण बन सकते हैं।
इसे घर का ( आग्नेय ) अग्नि कोण कहते हैं।
यह अग्नि तत्व की दिशा है।
इस दिशा में गैस, बॉयलर, ट्रांसफॉर्मर आदि होना चाहिए।
दक्षिण - पश्चिम दिशा -
🪨 नैऋत्य दिशा और स्थिरता
दक्षिण-पश्चिम को नैऋत्य कोण कहा जाता है। वास्तु परंपरा में इसे स्थिरता और भार से संबंधित माना जाता है।
इसी कारण इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत भारी और स्थायी उपयोग की संरचना रखने की परंपरा है।
नियम
- इस दिशा को अत्यधिक हल्का और अस्थिर न रखें।
- भारी भंडारण या स्थायी कक्ष की योजना भवन की समग्र संरचना देखकर की जा सकती है।
- यहाँ पानी का अनियंत्रित रिसाव नहीं होना चाहिए।
वास्तु-परंपरागत फल
इसे गृह की स्थिरता, निर्णय क्षमता और पारिवारिक आधार से जोड़ा जाता है।
इस दिशा को नैऋत्य दिशा कहते हैं।
इस दिशा में खुलापन अर्थात खिड़की, दरवाजे बिलकुल ही नहीं होना चाहिए।
घर के मुखिया का कमरा यहां बना सकते हैं।
कैश काउंटर, मशीनें आदि आप इस दिशा में रख सकते हैं।
घर का आंगन - घर में आंगन नहीं है तो घर अधूरा है।
घर के आगे और पीछे छोटा ही सही, पर आंगन होना चाहिए।
आंगन में तुलसी, अनार, जामफल, मीठा या कड़वा नीम, आंवला आदि के अलावा सकारात्मक ऊर्जा देने वाले फूलदार पौधे लगाएं।
वैदिक वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर में पीतल का कछुआ रखना शुभ माना जाता है।
धन प्राप्ति, वास्तु के इन नियमों को जानने के बाद घर में पीतल का कछुआ किस दिशा में रखने से होती है वरना जीवन पर पड़ने लगेगा उल्टा प्रभाव...!
🪔 ब्रह्मस्थान — घर का मध्य भाग
घर के मध्य भाग को कई वास्तु परंपराओं में ब्रह्मस्थान कहा जाता है।
इस क्षेत्र को अनावश्यक रूप से भारी करने से बचने की सलाह दी जाती है।
नियम
जहाँ भवन की संरचना अनुमति दे, वहाँ मध्य क्षेत्र को खुला, साफ और व्यवस्थित रखना अच्छा है।
लेकिन केवल वास्तु के नाम पर किसी संरचनात्मक दीवार या स्तंभ को हटाना उचित नहीं। सुरक्षा और इंजीनियरिंग को प्राथमिकता देनी चाहिए।
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💧 जल व्यवस्था का वास्तु :
घर में पानी जीवन का आधार है। वास्तु परंपरा में जल को विशेष तत्व माना गया है।
भूमिगत जल-स्रोत, कुआँ, जल निकासी, टंकी और अन्य जल-संरचनाओं के संबंध में विभिन्न वास्तु-ग्रंथों और परंपराओं में दिशानुसार मत मिलते हैं।
इसलिए एक ही नियम हर भवन पर लागू नहीं किया जाना चाहिए।
सबसे आवश्यक नियम :
पानी का रिसाव नहीं होना चाहिए।
रिसता हुआ नल या पाइप धन के वास्तु-दोष से अधिक पहले वास्तविक पानी की बर्बादी और भवन की क्षति का कारण बनता है।
वैदिक वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर में पीतल का कछुआ रखना शुभ माना जाता है।
इस से घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है और आर्थिक समस्याएं दूर होती हैं।
धन लाभ के नए रास्ते भी खुलते हैं।
वैदिक वास्तु शास्त्र के अनुसार सुख-समृद्धि के लिए कछुआ सही दिशा में रखना जरूरी है।
पीतल के कछुए को कभी भी दक्षिण दिशा में नहीं रखना चाहिए, वरना इससे जीवन पर उल्टा प्रभाव पड़ने लगता है।
वैदिक वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में पीतल का कछुआ रखने से घर में सकारात्मकता बनी रहती है।
पीतल के कछुए को घर में रखने से आर्थिक समस्याएं दूर होती हैं और धन प्राप्ति के नए मार्ग बनते जाते हैं।
साथ ही घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे कि घर में सुख और समृद्धि का वास होता है।
घर में पीतल का कछुआ रखते समय सही दिशा और नियमों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है।
आइए, जानते हैं घर में पीतल का कछुआ रखने के नियम और फायदे।
सही दिशा में पीतल के कछुए को रख दे :
वैदिक वास्तु शास्त्र के नियम के अनुसार सकारात्मक ऊर्जा के लिए चीजों को सही दिशा में रखना बहुत जरूरी है।
घर में पीतल का कछुआ रखना बहुत शुभ माना जाता है।
यह घर को सुरक्षा और समृद्धि प्रदान करता है।
इसे कवच की तरह माना जाता है।
पीतल, सोना या चांदी के कछुए को हमेशा उत्तर या उत्तर - पश्चिम दिशा में रखना चाहिए।
क्रिस्टल के कछुए के लिए ईशान कोण सबसे शुभ मानी जाती है।
विशेष नियम पीतल के कछुए को घर में रखने के:
कछुए को हमेशा पानी में रखना चाहिए, जिससे उसके पैर गीले रहें।
पानी भी रोज बदलना जरूरी है।
कछुए को ऐसी जगह रखें, जहां आप ज्यादा समय बिताते हैं।
कछुए को मुख्य द्वार के पास, घर के अंदर की तरफ मुंह करके रख सकते हैं।
अगर घर में मंदिर है, तो कछुए का मुंह मंदिर की ओर रखें।
इससे कछुए को सही वातावरण मिलता है।
पानी बदलने से साफ - सफाई रहती है और बीमारियों से बचाव होता है।
सकारात्मक ऊर्जा के लिए पीतल का कछुआ घर में रखें:
वैदिक वास्तु शास्त्र के अनुसार पीतल के कछुए को घर में रखने से शुभ फल मिलते हैं।
यह घर में खुशहाली और सकारात्मक ऊर्जा लाता है।
नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
सौभाग्य प्राप्त होता है।
कछुए को सही तरीके से रखना जरूरी है, तभी पूरा लाभ मिलेगा।
कछुए को घर की उत्तर पूर्व दिशा में रखना चाहिए।
इससे घर का वातावरण सुखमय बना रहता है।
परिवार में शांति और समृद्धि आती है।
🌳 घर और पंचमहाभूत :
वास्तु परंपरा में पंचमहाभूत—
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश
का विशेष महत्व है।
घर में इन पाँचों के उपयोग और संतुलन को वास्तु की मूल अवधारणा से जोड़ा जाता है।
पृथ्वी — स्थिरता
जल — प्रवाह
अग्नि — ऊर्जा और परिवर्तन
वायु — गति
आकाश — विस्तार और स्थान
घर में यदि प्रकाश, हवा और खुला स्थान बिल्कुल न हो, तो आधुनिक वास्तु और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी समस्या उत्पन्न हो सकती है।
🛏️ शयन-कक्ष और गृहस्थ जीवन :
घर का शयन-कक्ष भी वास्तु-विचार का हिस्सा है।
शयनकक्ष ऐसा होना चाहिए जहाँ पर्याप्त वेंटिलेशन, प्रकाश और निजता हो।
परंपरागत वास्तु में विभिन्न दिशाओं के अनुसार शयन-कक्ष के उपयोग के अलग-अलग नियम मिलते हैं।
परंतु यहाँ भी व्यक्ति की आयु, परिवार की संरचना, भवन की योजना और व्यावहारिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखना चाहिए।
🍚 अन्न और रसोई का सम्मान :
धन-समृद्धि का अर्थ केवल नकद धन नहीं है।
भारतीय परंपरा में अन्न को समृद्धि का आधार माना गया है।
रसोई स्वच्छ हो, अन्न सुरक्षित रखा जाए, भोजन की बर्बादी न हो और अग्नि का सम्मान किया जाए—
ये गृहस्थ जीवन के मूल संस्कार हैं।
नियम
- अनाज को नमी से बचाएँ।
- रसोई में गंदगी न रखें।
- भोजन की अनावश्यक बर्बादी न करें।
- खराब खाद्य पदार्थों को जमा न करें।
यह वास्तु के साथ-साथ वास्तविक आर्थिक बचत का भी नियम है।
🚪 मुख्य द्वार का महत्व :
मुख्य द्वार गृह का प्रवेश मार्ग है।
वास्तु परंपरा में इसे विशेष महत्व दिया जाता है।
मुख्य द्वार—
- स्वच्छ,
- सुरक्षित,
- प्रकाशयुक्त,
- सुगम और
- अवरोधमुक्त
होना चाहिए।
दरवाजे का टूटना, लगातार अटकना या ठीक से बंद न होना व्यावहारिक रूप से भी सुरक्षा समस्या है।
इसलिए वास्तु-उपाय के नाम पर केवल रंग बदलने के बजाय पहले वास्तविक खराबी ठीक करनी चाहिए।
🪐 जन्मकुंडली से गृह-सुख का विचार :
ज्योतिषीय परंपरा में चतुर्थ भाव को मातृसुख, गृह, भूमि, वाहन और मानसिक सुख से संबंधित माना जाता है।
द्वितीय भाव धन और परिवार से, नवम भाव भाग्य से, दशम भाव कर्म से तथा एकादश भाव लाभ से संबंधित माना जाता है।
यदि कोई व्यक्ति घर, भूमि या संपत्ति के विषय में प्रश्न करता है तो इन भावों के साथ उनके स्वामी, ग्रहों की स्थिति, दृष्टि, दशा और गोचर का अध्ययन किया जा सकता है।
इससे यह समझने का प्रयास किया जाता है कि व्यक्ति के जीवन में गृह-सुख और संपत्ति के अवसर किस प्रकार के हैं।
🌙 प्रश्नकुंडली का महत्व :
जब जन्मसमय निश्चित न हो और व्यक्ति तत्काल प्रश्न करे—
“यह घर मेरे लिए सुखद रहेगा या नहीं?”
तो प्रश्नकुंडली की परंपरा में प्रश्न के समय के आधार पर संकेतों का अध्ययन किया जाता है।
लेकिन प्रश्नकुंडली भवन का नक्शा नहीं है।
इसलिए इसे वास्तु निरीक्षण का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
⭐ गोचर और समय :
ग्रहों के गोचर को ज्योतिषीय परंपरा में वर्तमान समय के प्रभावों का अध्ययन माना जाता है।
गृह-निर्माण, खरीद, बिक्री, गृहप्रवेश या संपत्ति संबंधी महत्वपूर्ण निर्णयों में दशा और गोचर के साथ शुभ मुहूर्त का विचार किया जा सकता है।
नक्षत्र-पद्धति में भी शुभ समय चुनते समय नक्षत्र, तिथि, वार और अन्य मुहूर्तीय तत्वों का विचार किया जाता है।
🔢 अंकशास्त्र का सहायक विचार :
अंकशास्त्र में जन्मांक, नामांक या भवन संख्या का अध्ययन करने की परंपरा है।
लेकिन घर की दिशा, वास्तु-विन्यास और मकान संख्या को एक ही सिद्धांत नहीं माना जाना चाहिए।
मकान संख्या को लेकर कोई परंपरागत अंकशास्त्रीय उपाय किया जाए तो उसे सहायक उपाय के रूप में रखना उचित है।
✋ हस्तरेखा और सामुद्रिकशास्त्र :
हस्तरेखा में भाग्यरेखा, सूर्यरेखा, गुरु पर्वत, शुक्र पर्वत आदि का अध्ययन किया जाता है। सामुद्रिकशास्त्र में शरीर के विभिन्न लक्षणों के संकेतों का विचार किया जाता है।
इनसे व्यक्ति के स्वभाव और जीवन-प्रवृत्ति के पारंपरिक संकेत लिए जा सकते हैं।
लेकिन भवन का वास्तु निर्धारित करने के लिए भवन की वास्तविक दिशा और नक्शे का अध्ययन आवश्यक है।
📜 शास्त्रों के नाम पर अतिशयोक्ति से बचना :
ऋग्वेद, पुराण, भविष्यपुराण, भृगु संहिता और गर्ग संहिता आदि के नाम से प्रत्येक आधुनिक वास्तु-नियम को सीधे श्लोक या मूल-वचन बताना उचित नहीं।
भारतीय वास्तु परंपरा का साहित्य विशाल है और विभिन्न कालों में विभिन्न वास्तु-मत विकसित हुए हैं।
इसलिए किसी नियम को प्रस्तुत करते समय यह बताना अधिक उचित है कि वह वास्तु-परंपरा का सिद्धांत, ज्योतिषीय मत, धार्मिक आचरण या आधुनिक व्यावहारिक उपाय है।
यही शास्त्रीय ईमानदारी है।
🌾 घर को किन मुख्य नियमों के अधीन होना चाहिए ?
घर के लिए निम्न सिद्धांतों को आधार बनाया जा सकता है—
दिशा का संतुलन।
पंचमहाभूतों का संतुलित उपयोग।
उचित प्रकाश।
प्राकृतिक वेंटिलेशन।
स्वच्छ जल और उचित निकासी।
सुरक्षित अग्नि व्यवस्था।
मुख्य द्वार की स्वच्छता।
ईशान क्षेत्र की स्वच्छता।
मध्य भाग में अनावश्यक भारीपन से बचाव।
नैऋत्य में उचित स्थिरता।
वायव्य में उचित वायु-संचार।
उत्तर और पूर्व में प्रकाश तथा खुलापन।
अन्न और रसोई की स्वच्छता।
आय-व्यय में अनुशासन।
🌺 वास्तु के वास्तविक उपाय :
यदि घर में वास्तु-संबंधी समस्या दिखाई दे तो उपायों का क्रम होना चाहिए—
पहला — सफाई।
दूसरा — अव्यवस्था हटाना।
तीसरा — रिसाव और टूट-फूट ठीक करना।
चौथा — प्रकाश और वेंटिलेशन सुधारना।
पाँचवाँ — जल और अग्नि व्यवस्था सुरक्षित करना।
छठा — आवश्यकता होने पर वास्तु विशेषज्ञ से भवन का निरीक्षण करवाना।
सातवाँ — धार्मिक श्रद्धा हो तो पूजा, मंत्र-जप, दान और सेवा करना।
बिना आवश्यकता भवन तोड़ना, दीवार हटाना या बड़े निर्माण परिवर्तन करना उचित नहीं।
🙏 अंतिम शास्त्रीय संदेश
घर को वास्तु के अधीन करने का अर्थ भय पैदा करना नहीं है।
वास्तु का श्रेष्ठ उद्देश्य है—
स्थान का संतुलित, स्वच्छ, सुरक्षित और उपयोगी निर्माण।
जन्मकुंडली से व्यक्ति की ग्रहगत प्रवृत्तियों का विचार हो सकता है।
प्रश्नकुंडली तत्काल प्रश्न के संकेत देती है।
गोचर वर्तमान समय का अध्ययन करता है।
नक्षत्र - पद्धति मुहूर्तीय विचार में सहायक हो सकती है।
अंकशास्त्र, हस्तरेखा और सामुद्रिकशास्त्र अपनी - अपनी पारंपरिक पद्धतियों में संकेत देते हैं।
वास्तु भवन की वास्तविक व्यवस्था को देखता है।
इसलिए सुख-समृद्धि के लिए सर्वोत्तम समन्वित सूत्र है—
“भूमि शुद्ध और सुरक्षित हो,
दिशाएँ संतुलित हों,
ईशान स्वच्छ हो,
आग्नेय में अग्नि व्यवस्थित हो,
नैऋत्य में स्थिरता हो,
वायव्य में वायु का उचित संचार हो,
उत्तर और पूर्व में प्रकाश एवं खुलापन हो,
मध्य भाग अनावश्यक भार से मुक्त हो,
रसोई में अन्न का सम्मान हो,
और गृहस्थ जीवन में परिश्रम, सदाचार तथा आर्थिक अनुशासन हो।”
ऐसा घर केवल वास्तु की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन की दृष्टि से भी अधिक सुखद, सुरक्षित और व्यवस्थित बन सकता है।
॥ श्री वास्तुपुरुषाय नमः ॥ ॥ श्री महालक्ष्म्यै नमः ॥ ॥ श्री गणेशाय नमः ॥ ॥ सर्वे भवन्तु सुखिनः ॥
पंडारामा प्रभु राज्यगुरु
!!!!! शुभमस्तु !!!
🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
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जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏





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