वास्तु शास्त्र विद्या 6
वास्तु के अनुसार उत्तर - पश्चिम कोने के महत्व को समझ:
घर के उत्तर-पश्चिम कोना लेकर आएगा सकारात्मक ऊर्जा, बस अपनाएं ये वास्तु उपाय:
उत्तर-पश्चिम अर्थात वायव्य कोण का वास्तुशास्त्र में महत्व :
वायुमंडलीय कोने को वायव्य कोने के रूप में भी जाना जाता है, जो वास्तु शास्त्र में विशेष महत्व रखता है।
जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली, गोचर, नक्षत्र, अंकशास्त्र तथा वास्तु परंपरा के अनुसार प्रभाव, फल, नियम और उपाय !
यह कोना वायु तत्व और चंद्रमा ग्रह से जुड़ा हुआ है।
घर वह जगह है जहाँ आपको सुकून मिलता है।
भारतीय वास्तु परंपरा में प्रत्येक दिशा को केवल भवन की भौगोलिक दिशा नहीं माना गया, बल्कि उसे पंचमहाभूत, दिक्पाल, ऊर्जा, वायु, गति और जीवन के विभिन्न पक्षों से जोड़कर देखा गया है। इन्हीं दिशाओं में उत्तर-पश्चिम दिशा को वायव्य कोण कहा जाता है। यह उत्तर और पश्चिम के मध्य स्थित दिशा है।
वास्तु की पारंपरिक मान्यता में वायव्य कोण का संबंध वायु तत्व, गति, परिवर्तन, आवागमन, संपर्क, संबंधों में गतिशीलता और ऐसी परिस्थितियों से जोड़ा जाता है जिनमें स्थिरता के बजाय परिवर्तन अधिक रहता है।
इसीलिए घर में वायव्य दिशा का संतुलित होना महत्वपूर्ण माना गया है। यह दिशा न तो अनावश्यक रूप से भारी और बंद होनी चाहिए और न ही इतनी असंतुलित कि घर के वातावरण में अत्यधिक अस्थिरता उत्पन्न हो।
यहाँ यह बात विशेष रूप से समझनी चाहिए कि वास्तुशास्त्र के नियमों को आधुनिक वैज्ञानिक कारण-कार्य संबंध के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। वास्तु एक पारंपरिक भारतीय स्थापत्य-दृष्टि है। अतः इसके फल और प्रभावों को वास्तु परंपरा के अनुसार समझना उचित है।
वास्तु शास्त्र हमारे रहने की जगह में सामंजस्य और संतुलन बनाए रखने में मदद करता है।
उत्तर - पश्चिम कोना, जिसे अक्सर चंद्रमा और सहायक ऊर्जाओं से जोड़ा जाता है, रिश्तों, करियर और समग्र कल्याण को बढ़ाने की क्षमता रखता है।
आइए जानते हैं घर के उत्तर-पश्चिम कोने के वास्तु उपायों के बारे में।
वायुमंडलीय कोने को वायव्य कोने के रूप में भी जाना जाता है, जो वास्तु शास्त्र में विशेष महत्व रखता है।
यह कोना वायु तत्व और चंद्रमा ग्रह से जुड़ा हुआ है।
🌬️ वायव्य कोण का मूल महत्व
उत्तर-पश्चिम दिशा को परंपरागत वास्तु में वायु तत्व से जोड़ा जाता है। वायु का स्वभाव है—चलना, परिवर्तन करना और एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना।
इसी प्रतीकात्मक आधार पर वायव्य दिशा को घर में—
आवागमन, अतिथि, सामाजिक संपर्क, व्यापारिक गतिविधियों, संचार, परिवर्तन और गतिशीलता
से जोड़ा जाता है।
यदि इस दिशा का संतुलित उपयोग किया जाए तो पारंपरिक वास्तु-विचार में इसे घर की गतिविधियों के लिए उपयोगी माना जाता है।
लेकिन वायव्य दिशा को अत्यधिक भारी, बंद अथवा अत्यधिक अव्यवस्थित बनाना वास्तु परंपरा में अनुकूल नहीं माना जाता।
वास्तु में, उत्तर-पश्चिम कोना सहायता प्रणाली, सहायक मित्रों और यात्रा के अवसरों का प्रतिनिधित्व करता है।
उत्तर-पश्चिम कोना वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।
⭐ वायव्य दिशा और धन-समृद्धि
धन के संबंध में केवल उत्तर-पश्चिम दिशा देखकर निर्णय नहीं किया जाता।
ज्योतिषीय दृष्टि से धन के लिए जन्मकुंडली में मुख्य रूप से द्वितीय भाव, एकादश भाव, नवम भाव, दशम भाव और चतुर्थ भाव आदि का विचार किया जाता है। ग्रहों की स्थिति, भावेश, दृष्टि, दशा-अंतरदशा तथा गोचर भी देखे जाते हैं।
वास्तु में उत्तर दिशा को धन और आर्थिक गतिविधियों से जोड़ा जाता है, जबकि उत्तर-पश्चिम को गति और आवागमन से संबंधित माना जाता है।
इसलिए यदि किसी व्यापारिक भवन में ग्राहकों, माल, कर्मचारियों या अतिथियों का लगातार आवागमन होता हो, तो वायव्य दिशा की उचित योजना व्यावहारिक रूप से भी उपयोगी हो सकती है।
🕊️ वायव्य दिशा में अतिथि-कक्ष
वास्तु परंपरा में उत्तर-पश्चिम दिशा को अतिथि-कक्ष के लिए उपयुक्त माने जाने की परंपरा मिलती है।
इसका प्रतीकात्मक कारण भी स्पष्ट है—अतिथि आता है, कुछ समय रहता है और फिर चला जाता है। अर्थात उसमें स्थायी निवास की अपेक्षा गतिशीलता अधिक होती है।
इसी प्रकार ऐसे कमरे जिन्हें लंबे समय के बजाय अल्पकालिक उपयोग के लिए रखा जाता है, उन्हें वायव्य क्षेत्र से जोड़ने की पारंपरिक सलाह दी जाती है।
उत्तर - पश्चिम कोना चंद्रमा द्वारा शासित होता है, जो वास्तु शास्त्र में नौ खगोलीय पिंडों में से एक है।
उत्तर पश्चिम कोने के वास्तु टिप्स
हम वास्तु के अनुसार उत्तर - पश्चिम कोने के महत्व को समझ गए हैं, तो आइए इसकी सकारात्मक ऊर्जा के लिए
कुछ उपायों पर नज़र डालें:
इसे साफ और अव्यवस्था मुक्त रखें
मुख्य उपाय उत्तर-पश्चिम कोने को अव्यवस्थित करना है।
किसी भी अवांछित वस्तु को हटा दें, और सुनिश्चित करें कि यह साफ - सुथरा और सुव्यवस्थित हो।
यह सुनिश्चित करेगा कि इस दिशा में ऊर्जा स्वतंत्र रूप से प्रवाहित हो।
🐄 वायव्य और पशुधन संबंधी परंपरा
प्राचीन भारतीय गृह एवं ग्राम-व्यवस्था में पशुधन का विशेष आर्थिक महत्व था। इसलिए वास्तु परंपराओं में पशुशाला आदि के स्थान के विषय में दिशानुसार विभिन्न मत मिलते हैं।
वायव्य दिशा को गति और वायु से जोड़ने के कारण कुछ पारंपरिक वास्तु मतों में इसे पशुओं के स्थान के लिए भी विचार किया गया है।
लेकिन आधुनिक भवन में इसे सीधे सार्वभौमिक नियम नहीं बनाया जा सकता। पशुओं के लिए स्वच्छता, पर्याप्त वायु, जल, धूप, सुरक्षा और स्वास्थ्य-संबंधी आवश्यकताएँ प्राथमिक होनी चाहिए।
हल्के रंगों का उपयोग करें:
उत्तर - पश्चिम कोने की दीवारों को हल्के और सुखदायक रंगों से रंगें।
सफेद, हल्के भूरे या पेस्टल शेड अच्छे लगते हैं।
ये रंग जगह और शांति की भावना को बढ़ाते हैं।
💼 व्यापारिक प्रतिष्ठान और वायव्य कोण
व्यापार में ऐसी जगह जहाँ लगातार ग्राहक आते-जाते हों, वहाँ वायव्य क्षेत्र का उचित उपयोग परंपरागत वास्तु में लाभकारी माना जाता है।
विशेषकर—
- अतिथि प्रतीक्षा क्षेत्र,
- आवागमन वाला क्षेत्र,
- संपर्क अथवा स्वागत क्षेत्र,
- ऐसी वस्तुओं का भंडारण जिनका शीघ्र आवागमन हो,
आदि के लिए वायव्य दिशा पर विचार किया जा सकता है।
इसका मूल वास्तु सिद्धांत “वायु की गति” है।
🚪 वायव्य दिशा में मुख्य द्वार
मुख्य द्वार के विषय में केवल यह कहना कि “उत्तर-पश्चिम में द्वार है तो निश्चित रूप से धन आएगा” या “निश्चित रूप से धन जाएगा”, वास्तु की जटिल परंपरा को अत्यधिक सरल बना देना होगा।
मुख्य द्वार का विचार करते समय—
- भवन की पूरी दिशा,
- द्वार की वास्तविक स्थिति,
- प्लॉट का आकार,
- सड़क की दिशा,
- अन्य द्वार,
- भवन का उपयोग,
- आसपास की संरचना
आदि का विचार किया जाना चाहिए।
इसलिए केवल “उत्तर-पश्चिम द्वार” के आधार पर शुभ-अशुभ का अंतिम निर्णय नहीं करना चाहिए।
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⚖️ वायव्य दिशा में अत्यधिक भारीपन
वास्तु परंपरा में वायव्य क्षेत्र को अत्यधिक भारी और स्थायी भार से भरना सामान्यतः उचित नहीं माना जाता।
यदि इस क्षेत्र में वर्षों से कबाड़, अनुपयोगी मशीनें, टूटे फर्नीचर, भारी पत्थर या अनावश्यक सामान जमा हो तो घर की उपयोगिता भी कम होती है।
वास्तु-परंपरा में संभावित प्रभाव
ऐसे असंतुलन को अत्यधिक आवागमन, निर्णयों में अस्थिरता, अनावश्यक विवाद अथवा कार्यों में बार-बार परिवर्तन जैसे संकेतों से जोड़ा जाता है।
विंड चाइम :
उत्तर - पश्चिम कोने में विंड चाइम लटकाने से सकारात्मक ऊर्जा आकर्षित हो सकती है और सामंजस्यपूर्ण वातावरण बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
व्यावहारिक उपाय
वायव्य क्षेत्र को व्यवस्थित रखें। भारी सामान केवल इसलिए न रखें कि वहाँ जगह खाली है। भवन की संरचनात्मक आवश्यकता हो तो उसे बिना विशेषज्ञ सलाह के न बदलें।
धार्मिक प्रतीक :
प्रवेश द्वार के दोनों ओर और ऊपर ॐ, स्वास्तिक और त्रिशूल जैसे धार्मिक प्रतीक रखें।
ये प्रतीक द्वार पर सकारात्मक ऊर्जा और शांति लाते हैं।
🌪️ वायव्य दिशा को पूरी तरह बंद कर देना
वायु तत्व से संबंधित दिशा होने के कारण इस क्षेत्र में प्राकृतिक वेंटिलेशन और प्रकाश का उचित प्रबंध उपयोगी है।
पूरी तरह बंद, अंधकारमय और सीलनयुक्त स्थान घर के वातावरण के लिए व्यावहारिक रूप से भी अच्छा नहीं है।
इसलिए—
खिड़की + वेंटिलेशन + प्रकाश + स्वच्छता
का उचित प्रबंध रखें।
यह वास्तु की परंपरा के साथ-साथ भवन के सामान्य स्वास्थ्य और आराम के लिए भी उपयोगी है।
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💧 वायव्य में जल तत्व का प्रश्न
वास्तु परंपरा में जल, अग्नि, पृथ्वी और वायु के स्थानों को अलग-अलग महत्व दिया गया है। इसलिए वायव्य क्षेत्र में बड़े जल-स्रोत, भूमिगत टंकी अथवा अन्य संरचनाएँ बनाते समय पूरे भवन के वास्तु-विन्यास को देखना चाहिए।
किसी एक दिशा के आधार पर “यहाँ पानी रखने से निश्चित आर्थिक नुकसान होगा” कहना उचित नहीं है।
जल-स्रोत के संबंध में भूखंड का आकार, जल निकासी, भवन की संरचना और वास्तविक उपयोग भी महत्वपूर्ण हैं।
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🔥 वायव्य और अग्नि का असंतुलन
वास्तु परंपरा में अग्नि का प्रमुख संबंध दक्षिण-पूर्व अर्थात आग्नेय दिशा से माना जाता है। इसलिए रसोई और अग्नि संबंधी व्यवस्था बनाते समय वायव्य दिशा को आग्नेय का विकल्प मानना उचित नहीं।
यदि भवन की मजबूरी के कारण रसोई वायव्य क्षेत्र में हो, तो उसे केवल डर के आधार पर बदलने के बजाय पूरे वास्तु-विन्यास को देखकर निर्णय लेना चाहिए।
गैस, विद्युत उपकरण, चिमनी और पानी के स्रोत की सुरक्षा सबसे पहले रखनी चाहिए।
🪐 जन्मकुंडली से वायव्य दिशा का विचार
जन्मकुंडली में दिशाओं का विचार विभिन्न ज्योतिषीय और वास्तु परंपराओं में अलग-अलग तरीकों से मिलता है। इसलिए किसी एक ग्रह को हर स्थिति में वायव्य दिशा का एकमात्र स्वामी मानना उचित नहीं होगा।
यदि किसी व्यक्ति के जीवन में—
- नौकरी बार-बार बदलना,
- व्यवसाय में अत्यधिक उतार-चढ़ाव,
- साझेदारी में अस्थिरता,
- बार-बार स्थान परिवर्तन,
- संबंधों में अनिश्चितता
जैसी परिस्थितियाँ हों तो ज्योतिषीय परंपरा में कुंडली के संबंधित भाव, ग्रह, नक्षत्र, दशा और गोचर देखे जा सकते हैं।
इसके बाद वास्तु में वायव्य दिशा की वास्तविक स्थिति की जाँच सहायक रूप में की जा सकती है।
🌙 नक्षत्र और वायव्य दिशा
नक्षत्र-पद्धति में चंद्रमा की स्थिति, जन्म नक्षत्र और समय की प्रकृति को विशेष महत्व दिया जाता है।
गृह-निर्माण या गृह-प्रवेश जैसे कार्यों में पारंपरिक ज्योतिषी तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण, लग्न और अन्य मुहूर्तीय तत्वों का विचार करते हैं।
इसलिए वायव्य दिशा के लिए भी किसी एक नक्षत्र को सार्वभौमिक रूप से शुभ अथवा अशुभ घोषित करने के बजाय कार्य और मुहूर्त के संदर्भ में विचार करना उचित है।
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🔭 गोचर और गृह-संबंधी निर्णय
यदि किसी समय घर बदलने, नया भवन लेने, व्यापारिक स्थान बदलने या निर्माण आरंभ करने का निर्णय हो, तो ज्योतिषीय परंपरा में वर्तमान गोचर और दशा का विचार किया जाता है।
लेकिन गोचर यह सिद्ध नहीं करता कि भवन का वास्तु-दोष ही आर्थिक समस्या का कारण है।
दोनों विषय अलग हैं—
ज्योतिष = व्यक्ति और समय का संकेतात्मक अध्ययन।
वास्तु = भवन और स्थान का पारंपरिक अध्ययन।
दोनों को जोड़कर देखने पर अधिक व्यापक परंपरागत विश्लेषण प्राप्त होता है।
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🔢 अंकशास्त्र और वायव्य दिशा
अंकशास्त्र में भवन संख्या, नाम संख्या या जन्मांक आदि का विचार कुछ परंपराओं में किया जाता है।
यदि कोई व्यक्ति अपने भवन के अंक को लेकर प्रश्न करे तो अंकशास्त्रीय परंपरा से उसका विश्लेषण किया जा सकता है।
लेकिन मकान का अंक अकेले यह निर्धारित नहीं करता कि वायव्य दिशा शुभ है या अशुभ। दिशा और अंकशास्त्र को अलग-अलग सिद्धांतों के रूप में समझना चाहिए।
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✋ हस्तरेखा और सामुद्रिकशास्त्र का सहायक स्थान
हस्तरेखा और सामुद्रिकशास्त्र व्यक्ति के संकेतात्मक अध्ययन की अलग परंपराएँ हैं। इनमें भाग्यरेखा, सूर्यरेखा, गुरु पर्वत, शुक्र पर्वत आदि का विचार किया जाता है।
इनसे व्यक्ति के स्वभाव, कर्मप्रवृत्ति और जीवन के बारे में पारंपरिक संकेत लिए जा सकते हैं।
लेकिन घर के वायव्य कोण का वास्तु-दोष केवल हाथ देखकर निश्चित करना उचित नहीं। भवन का वास्तविक निरीक्षण आवश्यक है।
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🌾 वायव्य दिशा में धन-समृद्धि के लिए सरल उपाय
यदि वायव्य क्षेत्र अव्यवस्थित है तो सबसे पहले सफाई और व्यवस्था करें।
उपाय 1
कबाड़ और अनुपयोगी वस्तुएँ हटाएँ।
उपाय 2
वायव्य क्षेत्र में पर्याप्त प्रकाश और वेंटिलेशन रखें।
उपाय 3
अनावश्यक भारी वस्तुओं का जमाव न करें।
उपाय 4
दरवाजे और खिड़कियाँ ठीक प्रकार से खुलती-बंद होती हों।
उपाय 5
घर में टूटे हुए उपकरण लंबे समय तक न रखें।
उपाय 6
वायु और धूल की उचित निकासी रखें।
उपाय 7
यदि धार्मिक श्रद्धा हो तो अपने इष्टदेव की नियमित पूजा, दीपदान, प्रार्थना और दान करें।
उपाय 8
आर्थिक समृद्धि के लिए वास्तु के साथ आय-व्यय का उचित लेखा रखें।
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🪔 सबसे महत्वपूर्ण वास्तु सिद्धांत
वायव्य दिशा को ठीक करने के नाम पर बिना वास्तु-विशेषज्ञ या संरचनात्मक विशेषज्ञ की सलाह के दीवार तोड़ना, दरवाजा बंद करना, टंकी हटाना या कमरे की संरचना बदलना उचित नहीं है।
विशेषकर किसी मजबूत भवन में केवल किसी कथित वास्तु-दोष के कारण संरचनात्मक परिवर्तन करना आर्थिक और सुरक्षा दोनों दृष्टि से नुकसानदायक हो सकता है।
इसलिए पहले—
निरीक्षण → कारण की पहचान → सरल सुधार → आवश्यकता होने पर विशेषज्ञ परामर्श
का क्रम अपनाना चाहिए।
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🌺 वायव्य कोण का वास्तविक संदेश
वायव्य दिशा का सबसे सुंदर प्रतीक है—गति।
जहाँ वायु चलती है वहाँ परिवर्तन होता है। इसलिए यह दिशा हमें यह भी सिखाती है कि धन को केवल जमा करना ही पर्याप्त नहीं; धन का उचित प्रवाह, व्यापार का संचालन, संपर्क, अवसरों का उपयोग और विवेकपूर्ण खर्च भी आवश्यक है।
यदि घर में वायव्य दिशा स्वच्छ, व्यवस्थित, हवादार और उपयोगी है, तो यह वास्तु की दृष्टि से संतुलित माना जा सकता है।
और यदि उसी घर में जन्मकुंडली के धन-भाव मजबूत हों, दशा-गोचर अनुकूल हों, व्यक्ति कर्मठ हो, आय-व्यय नियंत्रित हो तथा घर का वातावरण शांत और व्यवस्थित हो, तो सुख-समृद्धि की वास्तविक संभावना और भी मजबूत होती है।
🙏 अंतिम निष्कर्ष
वास्तुशास्त्र में उत्तर-पश्चिम अर्थात वायव्य कोण को वायु, गति, परिवर्तन और आवागमन का क्षेत्र मानने की परंपरा है। इसे अत्यधिक भारी, गंदा, बंद और अव्यवस्थित रखना उचित नहीं माना जाता।
लेकिन किसी आर्थिक नुकसान को केवल वायव्य दिशा का दोष बताना भी उचित नहीं।
धन-संपत्ति के प्रश्न में—
जन्मकुंडली के द्वितीय और एकादश भाव,
कर्म के लिए दशम भाव,
भाग्य के लिए नवम भाव,
गृह-सुख के लिए चतुर्थ भाव,
दशा-अंतरदशा,
गोचर,
नक्षत्र,
प्रश्नकुंडली,
और भवन की वास्तविक वास्तु-संरचना
को अलग-अलग स्तर पर समझना चाहिए।
वास्तु का श्रेष्ठ उपाय भय नहीं, बल्कि संतुलन और सुधार है।
घर में स्वच्छता हो, जल की बर्बादी न हो, अग्नि सुरक्षित हो, वायु का उचित संचार हो, अन्न का सम्मान हो, धन का विवेकपूर्ण उपयोग हो, परिवार में प्रेम हो और कर्म में ईमानदारी हो—यही सुख-समृद्धि की सबसे मजबूत नींव है।
“वायव्ये वायु-गति का संतुलन,
उत्तर में आर्थिक व्यवस्था,
ईशान में पवित्रता,
आग्नेय में अग्नि का संतुलन,
नैऋत्य में स्थिरता—
और पूरे गृह में स्वच्छता, सदाचार एवं सद्भाव।”
इसी समन्वित दृष्टिकोण से वास्तु को जीवनोपयोगी बनाया जा सकता है।
॥ श्री वास्तुपुरुषाय नमः ॥ ॥ श्री महालक्ष्म्यै नमः ॥ ॥ श्री गणेशाय नमः ॥ ॥ सर्वे भवन्तु सुखिनः ॥ !!!!! शुभमस्तु !!!
🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
" Opp. Shri Ramanatha Swami Kovil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits, V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद..
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏



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